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सिमरन की मम्मियां

By:- A blog by Mr. Sanjay Sinha, Senior Executive Editor of AajTak. Dated: 27th January’18

कल मैं सिमरन की मम्मियों से मिल कर आया।  

मेरे पत्रकारीय जीवन में ये पहला मौका था जब मुझे कुछ बोलने के लिए बुलाया गया तो सामने कई सौ सिमरन की मम्मियां थीं।  

यकीनन आप सोच में पड़ गए होंगे कि संजय सिन्हा सिमरन की मम्मियों से मिलने गए, कौन सिमरन? और अचानक उन्हें मम्मियों से मिलने की क्या ज़रूरत पड़ी

मैं चाहूं तो अपनी इस मुलाकात का सस्पेंस अभी बनाए रख सकता हूं। लेकिन मैं ऐसा नहीं करूंगा। मैं चाहता हूं कि आप अभी सिर्फ उस सिमरन को याद करें, जो शाहरुख खान की फिल्मदिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगेकी नायिका थी। मुझे यकीन है कि फिल्म आपने देखी होगी। नहीं भी देखी हो तो कोई बात नहीं। संजय सिन्हा अपनी आंखों से पहले आपको वो फिल्म दिखलाएंगे, फिर कहानी आगे बढ़ाएंगे। 

सिमरन एक लड़की है, जिसे ज़िंदगी अपनी मर्जी से जीने का हक नहीं। वो बाऊजी की मर्जी से जीती है। बाऊजी जो चाहते हैं, उसे वही करना है। बाऊजी चाहे लंदन में रह रहे हो या भारत के किसी गांव में। इससे सिमरन की ज़िंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ता। बाऊजी पैसे वाले हों या गरीब, सिमरन का भाग्य इन बातों से नहीं बदलने वाला क्योंकि लड़कियों का मन बाऊजी जी संचालित करते हैं। 

दिल वाले दुल्हनिया ले  जाएंगेकी नायिका, जिसका नाम सिमरन था, वो तो लंदन में रहती थी, पर वो अपनी मर्ज़ी से नहीं जीती थी। उसे घूमने जाना है, तो अपने पिता, जिन्हें वो बाऊजी बुलाती है, से पूछना पड़ता है। उसे प्रेम करना है तो बाऊजी ही तय करेंगे। शादी करनी है तो बाऊजी ही तय करेंगे। सिमरन अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी नहीं जीती। 

पर एक दिन उसकी मां खड़ी हो जाती है और अपनी बेटी से कहती है कि सिमरन, तुम भाग जाओ इस घर से और वो कर लो, जो तुम करना चाहती हो। तुम अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी जियो। 

पर क्यों? वो ऐसा क्यों कहती है? मांएं भला अपनी बेटियों से ऐसा कहती हैं

सिमरन की मां कहती है कि मैं नहीं चाहती कि तुम्हारे साथ भी वही हो, जो मेरे साथ हुआ। मैं अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी नहीं जी पाई। पर मैं चाहती हूं कि तुम अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी जियो। 

बस ऐसी ही कुछ सिमरनों की मम्मियों से मैं कल मिल कर आया। 

कल मैं बुलंदशहर के पास अनूपशहर गया था। मुझे पता चला था कि वहांपरदादा-परदादीनामक लड़कियों का स्कूल है।

परदादा-परदादी नाम सुन कर मुझे लगा था कि कोई पुरातन पंथी स्कूल होगा। मुझे वहां कुछ बोलने को बुलाया गया था। मैंने मन में सोचा था कि गांव की लड़कियां होंगी, उन्हें मुझे कहानियां सुनानी होंगी। पर मेरे सामने तो एक भी लड़की नहीं थीं। सारी मांएं थीं। कोई घूंघट में, कोई सिर पर पल्लू लिए। मैं चुपचाप बैठा था। 

बहुत देर बाद पता चला कि ये वो मांएं हैं, जो अपनी बेटियों के सपनों को साकार होते देखने आई हैं। ये वो मांएं हैं, जिन्हें कभी स्कूल जाने का मौका नहीं मिला। जिनकी ज़िंदगी बाऊजी की मर्जी से गुज़र गई। पर जब बीस साल पहले यहां अमेरिका से आए बुलंदशहर के भाई वीरेंद्र सिंह ने लड़कियों के लिए स्कूल खोलने का  फैसला किया तो सबसे आगे लड़कियों की मांएं ही आईं। लड़कियों के बाऊजी तो तब भी कह रहे थे बेटियों को क्या पढ़ाना? पढ़-लिख कर वो करेंगी क्या? उन्हें तो दूसरे घर जाना है, चौका-बर्तन करना है, बच्चे पैदा करने हैं। वो कौन-सा हमारे काम आने वाली हैं, जो उनकी पढ़ाई पर पैसे खर्च किए जाएं?

वीरेंद्र सिंह जी, बुलंदशहर के एक गांव के रहने वाले हैं और बहुत कम उम्र में अमेरिका जा कर बस गए थे। वहां एक बड़ी कंपनी में वो चीफ की भूमिका में काम कर रहे थे। उन्हें वहीं की नागरिकता मिल गई थी। वहां उन्होंने खूब नाम और पैसे कमाए। पर मन में एक कसक रह गई थी कि अपने देश, अपने गांव के लिए कुछ नहीं कर पाए। इतने पैसे कमाए, पर समाज को कुछ लौटा नहीं पाए। बस इसी एक ख्याल ने उन्हें भारत की ओर मोड़ दिया। वो गांव चले आए और अपने पैसों से उन्होंने तय किया कि एक स्कूल खोला जाए। लड़कियों के लिए स्कूल। नाम दिया परदादा-परदादी स्कूल।

अनूपशहर में उन्होंने ये स्कूल खोला, पर कोई पिता अपनी बेटी को वहां पढ़ने भेजने को तैयार ही नहीं था। 

वीरेंद्र सिंह जी ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने गांव वालों को समझाना जारी रखा कि अपनी बेटियों को पढ़ाओगे तो उनका जीवन संवर जाएगा। वो मर्जी की जिंदगी जी पाएंगी। पर पिताओं को पता था कि बेटियां पराया धन होती हैं। उन पर पैसे खर्चने का कोई फायदा नहीं। 

वीरेंद्र सिंह ने संदेश भिजवाया कि पढ़ाई मुफ्त होगी। 

मुफ्त भी नहीं पढ़ानी हमें बेटियां। कहीं काम करेगी तो दस रूपए कमा कर लाएंगी।

अच्छा, स्कूल आने पर दस रूपए रोज़ भी दूंगा।

नहीं। उनके स्कूल आने-जाने पर कपड़े तो खरीदने होंगे।

यूनिफार्म भी स्कूल मुफ्त देगा, कॉपी-किताबें भी।

और वो बाहर निकलेंगी तो खाने-पीने पर उनका खर्च बढ़ेगा।

स्कूल उन्हें खाना भी देगा।

नहीं, तब भी नहीं भेजेंगे लड़कियों को स्कूल। बेटियां हैं, उनकी ज़िंदगी में कौन-सी क्रांति आनी है?”

बस यहीं खड़ी हो गईं, बेटियों की माएं। 

उन्हें स्कूल जाने दो जी। पढ़ लेंगी तो क्या पता उन्हें वो ज़िंदगी जीनी पड़े, जो हम जी रही हैं।

बाऊजी भड़के। पर घूंघट में चौके के चूल्हे में आंच तेज़ करती मांएं उठ खड़ी हुईं। जाओ, सिमरन तुम स्कूल जाओ। बाऊजी को हम देखते हैं। हम तुम्हारे साथ वो नहीं होने देंगे, जो हमारे साथ हुआ। हम चौका और घूंघट में फंस गए। तुम नहीं फंसोगी। तुम जाओ, सुना है कि धरती बहुत बड़ी है। ऊपर आसमान भी है। सुना है कि आदमी उड़ने भी लगा है। तुम जाओ। तुम उड़ जाओ। 

और बेटियां स्कूल आने लगीं। बहुत मुश्किलें आईं। पर आज इस स्कूल में करीब डेढ़ हज़ार बेटियां नर्सरी से बारहवीं तक की पढ़ाई कर रही है। 

कल संजय सिन्हा उन बेटियों से भी मिले, जो पढ़ कर अफसर बन रही हैं, खेल के नेशनल टीम में शामिल हो रही हैं, शोध कर रही हैं। उड़ रही है। अनूपशहर से अमेरिका की दूरी तय कर रही हैं। सबसे मिला। 

पर आज कहानी सिर्फ मम्मियों की। 

मैं उनसे मिला। कुछ से बातें भी की। बेटियां अंग्रेजी गाने गा रही थीं। मांए शब्द नहीं समझ रही थीं, पर उन बेटियों में खुद को जी रही थीं। वो जान रही थीं कि दुनिया में सिर्फ एक भाषा नहीं जो अनूपशहर मे बोली जाती हैं। दुनिया में हज़ार तरह की भाषाएं हैं और बेटियां उन्हीं में से एक बोल रही हैं। 

मांएं खुश थीं। अपनी सिमरनों को अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी जीते देख कर। 

मैं भी खुश था। उन मांओं से मिल कर। 

बच्चे मां-बाप के सपने होते हैं। पर उनकी एक ज़िंदगी होती है। सबको ज़िंदगी जीने का हक देना चाहिए। 

आज इतना ही। फिर कभी स्कूल की पूरी कहानी भी सुनाऊंगा। पर अभी तो मैं खोया हूं मम्मियों की उम्मीदों में। मैं खोया हूं मम्मियों के साकार होते सपनों में।

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